सुप्रीम कोर्ट के निर्देश- वन भूमि पर से बेजा कब्जा हटाओ, सीएम कहते हैं- अतिक्रमणकारियों को पट्टा दो - Bichhu.com

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश- वन भूमि पर से बेजा कब्जा हटाओ, सीएम कहते हैं- अतिक्रमणकारियों को पट्टा दो

  • वन भूमि पर हो रहे अतिक्रमण को लेकर दुविधा में हैं फॉरेस्ट ऑफिसर
  • मुख्यमंत्री चौहान के बयान से अतिक्रमण कार्यों के हौसले बुलंद

भोपाल (गणेश पाण्डेय/बिच्छू डॉट कॉम)।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत जिन लोगों का वन भूमि का मालिकाना हक सिद्ध नहीं हुआ है, उन्हें बेदखल किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश है कि सेटेलाइट सर्वे के आधार पर पात्र हितग्राहियों को पट्टे देने के अलावा शेष वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराएं। वहीं वोटों की राजनीति के चलते गत शनिवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा शनिवार को अफसरों को दी गई चेतावनी के बाद फॉरेस्ट अफसर किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में हैं। वन भूमि पर हो रहे अतिक्रमण को लेकर फॉरेस्ट ऑफिसर दुविधा में है।
देश में सबसे अधिक वन भूमि पर कब्जा मध्यप्रदेश में हुआ है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार अब तक मप्र में करीब 5,347 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि पर अतिक्रमण हो चुका है। जबकि दूसरे नंबर पर असम और तीसरे नंबर पर उड़ीसा का नाम है। प्रदेश के बैतूल, बुरहानपुर, खंडवा, देवास सीधी शहडोल सहित 2 दर्जन से अधिक वन मंडलों में अतिक्रमण हो रहे हैं। सबसे गंभीर स्थिति बुरहानपुर की है । यहां आदिवासी मुक्ति संगठन की सुप्रीमो माधुरी बेन खरगोन और बड़वानी से आए आदिवासियों को अतिक्रमण करने के लिए उकसा रही हैंं। पिछले वर्ष नेपानगर में ही अतिक्रमण को लेकर गोली भी चल चुकी है। बारिश शुरू होते ही अतिक्रमणकारी वनभूमि पर कब्जा करने लगे हैं। खास तौर से बुरहानपुर वन मंडल के नेपानगर क्षेत्र के बदनापुर की बीट क्रमांक-246 में हाल ही में बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई कर अतिक्रमण वनभूमि पर कब्जा किया जा रहा हैं। वन भूमि पर ही गत वर्ष जुलाई 2019 में गोली कांड हुआ था। बुरहानपुर में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। स्थानीय और बाहरी आदिवासियों के बीच संघर्ष होने की संभावना है। वन विभाग के अधिकारियों ने बुरहानपुर की स्थिति को लेकर कलेक्टर एसपी के अलावा अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी सूचना दे दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पट्टे देने की सख्त निर्देश देने के बाद अफसरों के हाथ पैर फूलने लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 19 में मध्य प्रदेश सहित 9 राज्यों में वन भूमि पर हुए अवैध कब्जे को हटाने के दिए निर्देश है। मध्य प्रदेश सहित 9 राज्यों में वन भूमि पर हुए अतिक्रमण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। साथ ही पात्र हितग्राहियों को बेदखल करने के निर्देश भी दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के साल भर बीत जाने के बाद अब तक किसी भी राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा नहीं दिया गया है। 9 राज्यों में लगभग 11लाख से अधिक आदिवासी वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत अपात्र पाए गए हैं। अपात्र हितग्राहियों के कब्जे से वन भूमि को बेदखल करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के वन सर्वेक्षण विभाग को उपग्रह से सर्वे करके अतिक्रमण की स्थिति सामने रखने के निर्देश दिए हैं।

हर साल होता है 7 सौ हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा
मध्य प्रदेश में वन विभाग के संरक्षण शाखा की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्रति वर्ष साढ़े 7 सौ हेक्टेयर से अधिक वन भूमि पर खेती और आवास बनाने के नाम पर अतिक्रमण हो रहा है। रिपोर्ट में ये बात भी स्वीकार की गई है कि वन भूमि से अतिक्रमण हटाने में मात्र 20 फीसदी ही सफलता मिल पाती है। रिपोर्ट में पिछले तीन साल के अतिक्रमण आंकड़ों का हवाला देकर कहा गया है कि 13209 हेक्टेयर में अतिक्रमण हुआ। जबकि मात्र 1039 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराने में वन महकमा सफल हो पाया।

हर साल 50 घायल होते हैं वनकर्मी
प्रदेश में वन भूमि पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। इसे हटाने में प्रति वर्ष करीब 50 वन सुरक्षाकर्मी घायल होते हैं। कुछ घटनाएं ऐसी भी सामने आई हैं जिनमें सुरक्षाकर्मियों को अतिक्रमण मुहिम में जान से हाथ धोना पड़ा है। प्रदेश में करीब पांच माह पहले खंडवा जिले के गुड़ी वन परिक्षेत्र के आमाखुजरी में अतिक्रमण हटाने गए रेंजर सहित अन्य वन कर्मी और पुलिस कर्मियों को अतिक्रमणकारियों ने हमला कर घायल कर दिया था। इस मामले में राजनीतिक दबाव के चलते उल्टे वन कर्मियों पर ही सरकार ने प्रकरण दर्ज करा दिया।

प्रति वर्ष खर्च होता है 26 सौ करोड़
वन विभाग वनों की सुरक्षा और विकास के नाम पर प्रति वर्ष विभाग 2600 करोड़ रुपए प्रति वर्ष खर्च करता है। इसके अलावा ग्रन इंडिया मिशन, कैंपा सहित अन्य मदों से विभाग को करोड़ों रुपए प्रति वर्ष दिया जाता है। इसके बाद भी वनों की सुरक्षा पूरी तरह से नहीं हो पा रही है। अतिक्रमण, अवैध कटाई और उत्खनन के मामले साल-दर-साल बढ़ते जा रहे हैं।

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