कमजोर विधायकों का कटेगा टिकट

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  • भाजपा का मिशन 2023 फतह

मप्र मे आगामी 2023 को विधानसभा चुनाव होने है ऐसे में भाजपा ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने मिशन 2023 फतह करने की फुलप्रूफ रणनीति बना ली है। इस रणनीति के तहत भाजपा का पूरा फोकस जहां 2018 में हारी 103 सीटों पर है, वहीं अपने कब्जे वाली सीटों की भी लगातार समीक्षा की जा रही है। पार्टी को विश्वास है कि शिव-वीडी की रणनीति से इस बार भाजपा 51 फीसदी वोटों के साथ 200 सीटों का टारगेट आसानी से पा लेगी।

हरीश फतेहचंदानी/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
इस साल मप्र सहित 9 राज्यों में चुनाव होना है। राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव की तैयारियां तेज कर दी हैं। मप्र में विधानसभा चुनाव होने में अब एक साल से भी कम का समय रह गया है। ऐसे में प्रदेश का राजनैतिक माहौल गर्म होने लगा हैं, तो वहीं राजनैतिक दल भी अपनी-अपनी चुनावी रणनीतियां तय करने में जुट गए हैं। हालांकि सत्ता की चाबी जनता किसे सौंपने वाली है ये तो भविष्य ही बताएगा लेकिन एक बात तय है कि 2023 का चुनावी मुकाबला आसान नहीं होने वाला है। मैदान में भाजपा पूरी शक्ति के साथ उतरेगी जैसा कि वह हर चुनाव में करती है। इसके लिए पार्टी ने रणनीति बनाई है कि इस बार कमजोर जनाधार वाले विधायकों का टिकट हर हाल में काटा जाएगा। पार्टी इसके लिए सर्वे भी कराएगी।
गौरतलब है की इस बार भाजपा ने 51 फीसदी वोट के साथ 200 सीटें जीतने का लक्ष्य निधारित किया है। इसके लिए पार्टी ने पूरी जमावट शुरू कर दी है। राज्य के बजट के बाद इस बार अप्रैल-मई से टिकट को लेकर एक्सरसाइज शुरू होने वाली है। भाजपा में इस बार टिकट के पैटर्न में कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे। कमजोर जनाधार वाले विधायकों के टिकटों पर इस बार खतरा है। फिर से जीत नहीं सकने वाले विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं। भाजपा जल्द सभी 230 सीटों पर बड़ा सर्वे करवाएगी। इस सर्वे में सैंपल साइज बड़ा लिया जाएगा ताकि हर सीट पर जनता की राय लेकर मौजूदा विधायक की खामियों, खूबियों और जीतने वाले उम्मीदवार पर तस्वीर साफ हो सके। संगठन के स्तर पर पहले भी कुछ सर्वे हुए हैं, लेकिन उनका सैंपल साइज बड़ा नहीं था। भाजपा संगठन के स्तर पर भी कई बार फीडबैक लिया गया है। भाजपा चुनावी साल में अब जो सर्वे करवाएगी, वह टिकट वितरण में बड़ा आधार बनेगा। अप्रैल-मई से लेकर अगस्त, सितंबर तक सर्वे का दौर चलेगा। हालांकि, हर चुनाव से पहले पार्टियां सर्वे करवाती रही हैं, लेकिन इस बार भाजपा सर्वे के पैटर्न में बदलाव करेगी और ज्यादा लोगों के बीच पहुंचकर राय लेने के लिए सैंपल साइज बड़ा करवाया जाएगा।

भाजपा की जमीनी पकड़ मजबूत
मप्र एक ऐसा राज्य है जहां भाजपा लगभग 18 साल से सरकार चला रही है और जमीन पर भी अच्छी तरह से पकड़ बनाए हुए है। आलाकमान ने अबकी बार 200 के पार का लक्ष्य निर्धारित कर चुनावी रणनीति बनाने के लिए शिवराज सिंह चौहान, वीडी शर्मा के साथ ही शिव प्रकाश को जिम्मेदारी सौंपी है। भाजपा की यह त्रिमूर्ति अभी से आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाकर संगठन को काम पर लगाएंगे। वहीं प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव, सह प्रभारी पंकजा मुंडे व विश्वेश्वर टुडे मॉनीटरिंग करेंगे। शिवराज सिंह चौहान इस राज्य का लंबे समय से नेतृत्व कर रहे हैं और चार बार सीएम पद पर रह चुके हैं। प्रदेश में अभी भी जामीनी स्तर पर शिवराज सिंह चौहान ही एक बड़ा चेहरा दिखायी देते हैं। वहीं वीडी शर्मा ने प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से प्रदेश में अपनी लोकप्रियता बढ़ाई है। गौरतलब है कि 2003, 2008 और 2013 में कांग्रेस को 75 सीटों के नीचे समेटने वाली भाजपा 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से पिछड़ गई। कांग्रेस को 114 और भाजपा को 109 सीटें मिली। इस कारण 15 साल बाद मप्र में कांग्रेस की सरकार बनी। जबकि भाजपा का वोट प्रतिशत (41.6 प्रतिशत) और कांग्रेस (41.5 प्रतिशत) से अधिक था। हालांकि 15 माह बाद ही कांग्रेस की सरकार गिर गई और एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन गई है। अब भाजपा की रणनीति यह है कि वह 2023 में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करना चाह रही है। इसके लिए अभी से रणनीतिक जमावट की जा रही है।
भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी अभी से मिशन 2023 की तैयारी में इसलिए जुटी हुई है कि आलाकमान ने आगामी विधानसभा चुनाव में 200 से अधिक सीटें जितने का लक्ष्य निर्धारित किया है। गौरतलब है की 2018 में भी भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अबकी बार 200 के पार का नारा दिया था। मप्र विधानसभा चुनाव तक भाजपा की तरफ से इस नारे को खूब हवा दी गई और दावा किया गया कि भाजपा इस बार सीटों की आंकड़ा 200 पार करेगी। 28 नवबंर 2018 को हुई बंफर वोटिंग के बाद लगा की भाजपा का दावा हकीकत में बदल सकता है, लेकिन भाजपा 109 पर सिमट कर रह गई। दरअसल, भाजपा ने यह लक्ष्य इसलिए निर्धारित किया है कि क्योंकि मप्र विधानसभा की 230 सीटों में से 207 ऐसी सीटें हैं जिनको भाजपा कभी ना कभी जीत चुकी है। भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं कि 2018 में भाजपा ने इसी आधार पर 200 पार का नारा दिया था, लेकिन पार्टी बहुमत के आंकड़े (116)को भी नहीं छू पाई। इसके पीछे वजह थी रणनीतिक कमजोरी और अतिविश्वास। इसलिए भाजपा आलाकमान ने इस बार 3 साल पहले से ही चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।

संगठन की ताकत पर जीतेगी भाजपा: वीडी शर्मा
आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने जिलों में जाकर फीडबैक ले रहे हैं। गतदिनों उन्होंने जबलपुर में भाजपा के संभागीय कार्यालय मे महाकौशल के सांसद और विधायकों से वन टू वन चर्चा की। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने करीब तीन घंटों तक सांसद-विधायक से चर्चा की। जिसमें संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने पर मंथन हुआ। संभाग की 38 विधानसभा पर एक-एक विधायकों से वीडी शर्मा ने बंद कमरे में चर्चा की। बैठक में संभाग से 43 सदस्य आपेक्षित थे जिसमें 37 मौजूद रहे। संभागीय बैठक करने के बाद वीडी शर्मा ने कहा संगठनात्मक दृष्टि से कई पहलुओं पर कार्य विस्तार को लेकर चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि आगामी 2023 के चुनाव की तैयारी भी शुरू हो गई है। शर्मा ने कहा कि अनेक योजनाओं की मदद से केंद्र व प्रदेश की सरकारें गरीबों का जीवन बदल रही हैं। जीवन बदलने के इस अभियान में जनप्रतिनिधि भी सहभागी बनें। आयुष्मान कार्ड बनाने के लिए सभी अपने वार्डों में जुट जाएं। और लोगों तक नर सेवा ही नारायण सेवा का मंत्र लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना और जनहित की अन्य योजनाओं का लाभ पहुंचाने में जुट जाएं। प्रदेशाध्यक्ष कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अनुसार हम कांग्रेस की नाकामियों से 2014 का लोकसभा चुनाव जीते, उस समय हमें 17 करोड़ वोट मिले। जबकि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हम 23 करोड़ वोट के प्रचंड बहुमत से जीते। इसमें गरीब कल्याण की योजनाओं के कारण ही 6 करोड़ वोटों की वृद्धि हुई है। ऐसे में अब भाजपा के संगठन की ताकत और विचार के बल पर 2024 का चुनाव जीता जाएगा। अत: सभी जनप्रतिनिधि संगठन को सुदृढ़ बनाने में जुट जाएं। प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा के अनुसार हमको गर्व होना चाहिए कि हम डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं द्वारा खड़ी की गई पार्टी के कार्यकर्ता हैं। जब कश्मीर में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में धारा 370 लगाई गई, तो मंत्रिमंडल से उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जनसंघ की स्थापना इसके बाद ही हुई। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1980 में भाजपा की स्थापना हुई। उसी बलिदानी भाजपा के हम कार्यकर्ता हैं।
गौरतलब है कि 51 प्रतिशत वोट शेयर के साथ अजय होने का संकल्प लेकर भाजपा ने 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है। मध्य प्रदेश में पार्टी ने कुशाभाऊ ठाकरे जन्मशती वर्ष में बूथ विस्तारक योजना तैयार की थी। इसके तहत बूथ स्तर पर काम की निगरानी और संदेश आदि पहुंचाने के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग किया गया। इतना ही नहीं, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की जानकारी, उनसे जुड़े डेटा का डिजिटलाइजेशन भी किया गया। इसके अच्छे परिणाम देखकर पार्टी अखिल भारतीय स्तर पर इसके प्रशिक्षण की योजना बना रही है। इसमें मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष सहित पन्ना प्रभारियों तक की जिम्मेदारियां तय की गई हैं। इसके तहत केंद्र एवं प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों से चर्चा कर भाजपा के पक्ष में अभी से माहौल बनाने की तैयारी है। पार्टी ने स्मार्ट बूथ पर जो काम शुरू किया है, उसके अनुसार अब बूथ स्तर के कार्यकर्ता को भी नई पहचान मिल सकेगी। पार्टी प्रदेश के 65 हजार बूथ अध्यक्ष, महामंत्री और बूथ एजेंट को पार्टी संगठन में विशेष तवज्जो देने जा रही है। भाजपा पिछले कुछ वर्षों में वृहद स्तर पर सदस्यता अभियानों के बाद खुद को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बताती आ रही है। इसका श्रेय किसी बड़े चेहरे या पदाधिकारियों के बजाय लाखों कार्यकर्ताओं को दिया जाता है, लेकिन उन्हें अलग से विशेष पहचान की कमी महसूस होती रही है। स्मार्ट कार्ड दिए जाएंगे। बूथ के तीन पदाधिकारियों अध्यक्ष, महामंत्री और बीएलए, जिन्हें संगठन में त्रिदेव की संज्ञा दी गई है, उन्हें स्मार्ट कार्ड दिए जाएंगे। इस पर यूनिक नंबर के साथ कार्ड पर उनका पूरा परिचय होगा। पन्ना प्रमुखों को भी विशिष्ट पहचान पत्र मिलेगा। पार्टी ने बूथ विस्तारक योजना के तहत बूथ समिति का अंकन रजिस्टर और संगठन में किया है। इसमें बूथ समिति, बूथ अध्यक्ष, बूथ महामंत्री और बीएलए सहित पूरी समिति और पन्ना प्रमुख पन्ना समिति के साथ ही मतदाताओं के नाम भी दर्ज हैं।

जीत के शिल्पकार बनेंगे पन्ना प्रमुख
गुजरात चुनाव में मिली ग्रैंड सक्सेस को भाजपा मध्य प्रदेश में भी दोहराना चाहती है। इसके लिए गुजरात चुनाव मॉडल को प्रदेश में लागू करने की अटकलें भी हैं। गुजरात की जीत में पन्ना प्रमुख को मुख्य हथियार बताया जा रहा है। इसी तर्ज पर बीजेपी पन्ना प्रमुख के सहारे मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव को बढ़े आंकड़े से जीतने में जुट गई है। पार्टी का दावा है कि अब तक चार लाख पन्ना प्रमुख बना लिए हैं। साथ ही बूथ अध्यक्षों को पन्ना प्रमुख बनाने के साथ एप से जोडऩे की जिम्मेदारी दी गई है। बता दें कि पन्ना प्रमुख वह कहा जाता है, जिसके पास वोटर लिस्ट के एक पन्ने की जिम्मेदारी होती है। हर पन्ने पर पांच पन्ना सदस्य होते हैं। मध्य प्रदेश में बीजेपी चुनावी तैयारी में जुट गई है। उसका पूरा फोकस पन्ना प्रमुखों पर है। प्रदेश में 64 हजार 100 बूथ पर बीजेपी पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। करीब 13 लाख बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को संगठन एप से जोड़ा गया है। बूथ पर बीजेपी ने एक बूथ अध्यक्ष, महामंत्री और बीएलए की नियुक्ति की है। इसके साथ ही पन्ना प्रमुख और पन्ना समिति भी बनाई, लेकिन उनकी संख्या कम है। अब बीजेपी ने बूथ अध्यक्षों को पन्ना प्रमुख और समिति बनाने और डिजिटल एप से जोडऩे के निर्देश दिए हैं। प्रदेश में वोटर लिस्ट में 18 लाख पन्ने हैं, जो बढक़र 20 लाख के करीब पहुंचने की उम्मीद है। इसको देखते हुए ही मध्य प्रदेश में ही बीजेपी को एक करोड़ से अधिक पन्ना समिति सदस्यों की आवश्यकता होगी। यह एक बड़ा नंबर है, जिसे भाजपा हासिल करना चाहती है। यदि यह सफल हो जाती है तो उसके पास सदस्य के प्रति परिवार तीन वोटर के हिसाब से सीधे सीधे तीन करोड़ वोट होंगे। अभी बीजेपी के चार लाख पन्ना प्रमुख ही बने हैं। इन पन्ना प्रमुख की मदद से ही बीजेपी घर-घर तक पहुंच बनाएगी। गुजरात जीत के बाद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि हम पन्ना प्रमुख से आगे बढ़ कर अब घर घर अभियान पर काम कर रहे हैं। अब भाजपा की तरफ से कोई ना कोई घर-घर तक जाएगा और लोगों से संवाद स्थापित करेगा। बता दें इसमें पन्ना प्रमुख की भूमिका अहम होगी।
बीजेपी की रणनीति पन्ना प्रमुख के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का ना सिर्फ प्रचार-प्रसार बल्कि हितग्राहियों को जोडऩा है। पीएम आवास, स्ट्रीट वेंडर योजना में लोन लेने वाले हितग्राहियों की मैपिंग करेंगे और उनको आईडेंटिफाई करेंगे। और उनको पार्टी की विचारधारा से जोडऩे का काम करेंगे। बीजेपी के बूथ के डिजिटल होने से कार्यकर्ताओं तक एक क्लिक में संगठन के निर्णय और फैसलों की जानकारी पहुंच जाएगी। बूथ का कार्यकर्ता जनता का फीडबैक एप के माध्यम से संगठन तक आसानी से कम समय में पहुंचा सकेगा। जिस पर पार्टी को निर्णय लेने में आसानी होगी। जनता तक पार्टी का मैसेज पहुंचाने में भी यह आसान होगा। चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची के हरेक पेज पर 30 नाम होते हैं। बीजेपी ने एक पेज में शामिल 30 नामों में से पांच लोगों को पार्टी की पेज समिति का सदस्य बना रखे हैं, यानी चुनाव आयोग की सूची में शामिल हर 6वां व्यक्ति बीजेपी पन्ना समिति का सदस्य। हर पन्ना सदस्य के घर में कम से कम तीन सदस्य तो होते ही हैं। कई पन्ना सदस्यों के घरों में 4-5 वोटर भी मौजूद हैं, जिससे उसके वोटर्स की संख्या बढ़ जाएगी। पार्टी नेता इसे मॉडरेट ढंग से जोड़ते हैं, तो भी प्रत्येक पन्ना सदस्य घर के तीन वोट तो जुटाता ही है। पन्ना समिति का एक पन्ना प्रमुख भी है, जो सभी सदस्यों से टच में रहता है। पन्ना प्रमुख की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने 30 वोटर से बात करके उनसे संपर्क करके यह तय करे कि वे सभी मतदान करें और बीजेपी के पक्ष में वोट करें। उत्तर प्रदेश और गुजरात में सफल रहे इस प्रयोग में कोशिश की गई कि समिति में ऐसे लोगों को सदस्य बनाया जाए, जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार की योजना का लाभ मिला हो।

हारी सीटों पर माइक्रो लेवल पर काम
अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा का सबसे ज्यादा ध्यान आकांक्षी विधानसभा सीटों पर है। यह वह सीटें हैं जिनमें पार्टी को पिछली बार पराजय मिली थी। इनकी संख्या 103 है। अब इन सीटों के हर बूथ में 51 प्रतिशत मत पाने के लिए पार्टी ने रणनीति तैयार की है। इसमें कार्यकर्ताओं को साधने से लेकर मतदाताओं को रिझाने तक विशेष योजना है। इस योजना के तहत पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, प्रदेश प्रभारी पी मुरलीधर राव जीत का प्लान बनाकर मैदानी मोर्चा पर सक्रिय हो गए हैं। गतदिनों आकांक्षी विधानसभा सीटों को जीतने की रणनीति पर चर्चा के लिए आकांक्षी विधानसभा प्रभारियों की बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा, प्रदेश प्रभारी पी मुरलीधर राव, संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा ने प्रभारियों को जीत का मंत्र दिया। शर्मा ने बताया कि पार्टी ने प्रत्येक बूथ पर 51 प्रतिशत मत पाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए सबसे ज्यादा जोर इस बात पर है कि प्रदेश में विकास के जो कार्य भाजपा सरकार ने किए हैं वह निचले स्तर तक पहुंचें। पार्टी की रीति-नीति हर मतदाता को पता हो। यह तभी हो सकता है जब एक-एक बूथ को सुदृढ़ किया जाए। पार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा ने हारी सीटों को लेकर माइक्रो लेवल पर काम करना तय किया है। इसके तहत इन सीटों पर अब प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का फोकस होगा। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष भी इन सीटों पर निचले स्तर तक नेटवर्क को मजबूत करने के लिए एक-एक कर जिलावार दौरा करेंगे। इसके लिए नए साल में ताबड़-तोड़ दौरे होंगे। भाजपा ने चुनाव की व्यूह रचना में वोट बैंक और एरिया आधारित लक्ष्य तय किया है। हारी 103 सीटों को लेकर विशेष तौर पर काम होगा। ये वे सीटें हैं, जिन्हें भाजपा 2023 में फतह करने का लक्ष्य लेकर चलेगी। इसमें टिकट, भितरघात या कम वोट से हारने वाली सीटों को लेकर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। मुरलीधर राव खुद एक-एक कर इन सभी सीटों पर जाएंगे। वीडी शर्मा अलग से इन सीटों को लेकर बूथ स्तर का संपर्क अभियान चलाएंगे।
51 फीसदी वोट के साथ 200 सीटें जीतने का टारगेट लेकर चल रही भाजपा की कोशिश है की 2018 में जिन 103 सीटों पर हार मिली है उसे हर हाल में जीता जाए। इसके लिए पार्टी ने दौरा, समन्वय और चेहरे पर फोकस करने की रणनीति बनाई है। इसके तहत जनवरी से प्रदेश में दौरे शुरू होंगे। 6 माह के भीतर सीटें कवर कर ली जाएंगी। बाद में नेताओं के चुनावी कैम्पेन शुरू होंगे। वहीं जिन सीटों पर पिछली बार भाजपा चुनाव हार गई थी। इस बार वहां पर समन्वय को ज्यादा प्राथमिकता दी जानी है। साथ ही भाजपा ने हारी सीटों पर बूथ स्तर पर युवाओं को प्राथमिकता से जोडऩा शुरू किया है। हर बूथ पर दो युवा जोड़े जाने हैं। उधर, कांग्रेस की चुनौती कमजोर सीटों पर अधिक है। वर्ष 2018 के चुनाव- में कांग्रेस को 119 सीटें मिली थीं। उपचुनाव के बाद कांग्रेस की सीटें सिमटकर 96 हो गई। ऐसे में कांग्रेस की बड़ी चुनौती हारी हुई सीटों पर अधिक है। यहां जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश है। सर्वे का सहारा लिया जा रहा है। दूसरी ओर 50 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस इन्हें पूरी तरह से सुरक्षित मान रही है। इनमें से 40 सीटों पर तो मौजूदा विधायकों से कहा दिया गया है कि वे वहां मैदान संभाल लें। शेष के मामले में निर्णय लेना है। भाजपा ने 103 सीटों को मजबूत करने की रणनीति बनाई है। इसके लिए वरिष्ठ नेता, पूर्व जिला अध्यक्ष, क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले नेता, पूर्व संगठन मंत्रियों और विधायकों को एक-एक सीट की जिम्मेदारी सौंपी है। इनका काम कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना और संगठन से दूर हुए कार्यकर्ताओं को एक्टिव करना है। हारी सीटों को भाजपा ने आकांक्षी नाम दिया है। इनको मजबूत करने के लिए प्रभारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। भाजपा ने छह पूर्व संगठन मंत्री शैलेंद्र बरुआ, आशुतोष तिवारी, जितेंद्र लिटोरिया, केशव सिंह भदौरिया, पूर्व प्रदेश पदाधिकारी विनोद गोटिया और विधायक राजेंद्र शुक्ला को शामिल किया है। कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों की सीटों पर भी नाराज कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को मनाया जाएगा। पार्टी ने प्रभारियों को हर बूथ पर 10 प्रतिशत वोट बढ़ाने को लेकर रणनीति बनाने को कहा है। साथ ही सुझाव भी मांगे हैं। प्रदेश की 230 सीटों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में भाजपा के पास 127, कांग्रेस के पास 95 और अन्य के पास 7 सीटें है। भाजपा ने हारी 103 सीटों पर चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा कांग्रेस विधायकों की सीटों पर अभी से जनता की नाराजगी का फायदा उठाने में जुट गई है।

चुनाव की माइक्रोप्लानिंग
विधानसभा चुनाव के लिए इस बार प्लानिंग नहीं माइक्रो प्लानिंग हो रही है। 2018 में अपने ओवर कॉन्फिडेंस या कुछ अन्य फेक्टर्स के चलते सत्ता में आने से चूकी भाजपा, इस बार कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है। चुनाव में भले ही सवा साल बाकी हो लेकिन भाजपा की रणनीति अभी से बनना शुरू हो चुकी है। तरकश में रखे तीरों से तीन खास निशान भेदने हैं। ये तीर संभालेंगे त्रिदेव और पूरा करेंगे भाजपा का मिशन 100। मिशन 100 सुनकर आप जरूर सोच सकते हैं कि सत्ता में आने के लिए सिर्फ शतक लगाना काफी नहीं। एक मुतमईन सरकार बनाने के लिए सीटें तो इससे बहुत ज्यादा चाहिए। ताकि पांच साल इत्मीनान से काटे जा सकें। फिर भाजपा की सुई सिर्फ सौ पर ही क्यों अटक गई है, तो बता दें कि ये सौ का आंकड़ा भाजपा के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है और अगर रणनीति कामयाब रही जो भाजपा का ये मिशन 100 अगले चुनाव में कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम कर देगा। वैसे भाजपा के इस मिशन के आगाज से पहले कांग्रेस नींद से तो जाग चुकी है। चुनाव के मद्देनजर भाजपा में हर स्तर पर फेरबदल का दौर जारी है। सत्ता, संगठन और प्रशासनिक स्तर पर तेजी से चेहरे बनाने और बदलने की कवायद चल रही है। कोशिश यही है कि अगला विधानसभा चुनाव किसी हाल में हाथ से फिसलना नहीं चाहिए। इसके लिए भाजपा के आला नेता हर दूसरे दिन एक साथ मिलकर माथा पच्ची कर रहे हैं। प्लानिंग ऐसी करने की कोशिश है जो बारीक से बारीक फेक्ट भी चूक न जाए। यही वजह है कि खास फोकस तो उन 96 सीटों पर है जो कांग्रेस के खाते में हैं।
मिशन 100 के बहाने सिर्फ ताबड़तोड़ तरीके से शतक लगाने का भाजपा का कोई इरादा नहीं है। प्लानिंग ऐसी की जा रही है कि वोट प्रतिशत भी बढ़ें और रूठा मतदाता भी गुस्सा थूक दे। इन मतदाताओं में भी सबसे ज्यादा उन मतदाताओं को रिझाना है, जो अनुसूचित जाति, जन जाति से आते हैं। पार्टी ने दिग्गज नेताओं को इन सीटों पर तैनात करने का प्लान बनाया है, ताकि हर एक सीट पर बूथ मैनेंजमेंट को मजबूत किया जा सके और 2023 में इन सीटों पर भाजपा की वापसी हो। भाजपा ने हर सीट पर चुनाव होने तक सांसद-विधायकों और जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी तय कर दी गई है। पार्टी ने सभी नेताओं को इन सीटों को जीतने के लिए माइक्रो प्लानिंग बनाने की भी सलाह दी है। जबकि संगठन की निगरानी में इन नेताओं को इन सीटों पर लगातार दौरे होते रहेंगे। इसका पूरा मैनेजमेंट संगठन की निगरानी में होगा। राज्यसभा सांसदों, प्रदेश के केंद्रीय मंत्री और प्रदेश पदाधिकारियों को भी इन सीटों पर जाना पड़ेगा। इसके अलावा प्रदेश सरकार के मंत्री भी इन सीटों पर विशेष फोकस रखेंगे। दरअसल 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रदेश के कुछ अंचलों में नुकसान हुआ था। पार्टी को ज्यादातर मालवा-निमाड़, ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड अंचल की सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। बता दें कि मालवा-निमाड़ मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा अंचल है। इस अंचल में प्रदेश की 65 विधानसभा सीटें आती है। लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा की सीटें घटकर आधी रह गई थी। ऐसे में पार्टी सबसे ज्यादा मालवा-निमाड़ पर फोकस कर रही है। जबकि ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड अंचल की सीटों पर भी भाजपा सक्रिए है। इन सीटों पर अपनी माइक्रोप्लानिंग में भाजपा तमाम पहलुओं पर नजर जमा रही है।

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